“ख्यालों की भीड़ में मैं”

Overthinker Hona Bhi Ek Kahani Hai

Bachpan se ही मैं overthinker रही हूँ।
Summer holidays का homework न करूँ तो दिमाग में सौ सवाल—स्कूल से आकर सो जाऊँ या पहले पढ़ लूँ? तब ये समझ ही नहीं था कि छुट्टियों के बाद तो नई क्लास का syllabus शुरू हो जाता है। पर मेरे लिए हर छोटी बात भी किसी बड़े फैसले जैसी होती थी।
मैंने सबकी बात मानी—मम्मी, पापा, teachers—पर overthinking का सिलसिला कभी रुका नहीं। हाँ, कभी-कभी मैं “नहीं” भी बोल देती हूँ उन चीज़ों को जो मुझे पसंद नहीं, लेकिन उसके बाद दिमाग में मानो सुनामी आ जाती है 🌊।

एक पूरी फिल्म चलने लगती है—
“उसने मेरे बारे में क्या सोचा होगा?”
“मैं अजीब तो नहीं लग रही थी?”
“कल थोड़ा कम बोलूँ या ज़्यादा?”

सच कहूँ तो मेरा दिमाग Netflix से ज़्यादा series बनाता है—और वो भी बिना किसी subscription के।
Social interaction मेरे लिए practical exam जैसा होता है। चेहरे पर confidence पूरा दिखेगा, लेकिन अंदर से हालत खराब रहती है। कभी-कभी लगता है मैं किसी से बात नहीं कर रही, बल्कि अपना interview दे रही हूँ। इसी वजह से anxiety भी अक्सर मुफ्त में साथ चली आती है।

अब धीरे-धीरे समझ आ रहा है—
सामने वाला इंसान हमारे बारे में उतना सोचता ही नहीं,
जितना हम अपने दिमाग में पूरी script लिख लेते हैं।
मैं शायद omnivert हूँ—
कभी पूरा बोलता हुआ रेडियो,
तो कभी बंद पड़ा WiFi।

Meditation करने बैठती हूँ तो दो मिनट में दिमाग बोल पड़ता है—
“पहले 2050 तक की planning कर लेते हैं।”
मेरे लिए overthinking ऐसे है जैसे विचार पानी की बूँदें हों, और मेरा मन उन्हीं बूँदों से भर जाता हो—कभी शांत तालाब, कभी भयानक तूफान।

पर अब मैं सीख रही हूँ—
हर ख्याल सच नहीं होता,
और हर डर हमेशा के लिए नहीं रहता।
आज भी दिमाग कहानियाँ बनाता है,
पर अब मैं हर कहानी की हीरोइन बनने के बजाय
सिर्फ उसे देखने वाली बनना सीख रही हूँ।

दो पंक्तियाँ अंत के लिए
“दिमाग की भीड़ में अक्सर दिल की आवाज़ खो जाती है।”
“सोच उतनी ही रखो जितनी सुकून दे,
वरना ज़िंदगी सवाल बन जाती है।”

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